रांझना : हीर बिन रांझा
विजय कुमार जायसवाल
'रांझणा' एक प्रेम कहानी है| कुंदन (धनुष) एक दक्षिण भारतीय हिंदू है जो वाराणसी में अपने मां-बाप के
साथ रहता है| उसके पिता (विपिन शर्मा) एक मंदिर में पुजारी हैं|बनारस का एक सीधा-सादा
लेकिन मुंहफट और अक्खड़ लौंडा एक मुस्लिम लड़की से प्यार करता है| बनारस की तंग
गलियों में बने घाटों के बीचनन्हा कुंदन अपने सबसे खास दोस्त मुरारी (जीशान) और
हवलदार की बेटी बिंदिया(स्वरा भास्कर) के साथ दिन भर मौज मस्ती करता है। बिंदियाबचपनसेहीकुंदनकोचाहतीहैऔरउससेशादीकरनाचाहतीहै
|पर
कुन्दन का दिल तो काही और अटका पड़ा है|
10साल के कुंदन ने पहली बार जब जोया (सोनम कपूर) को देखा तो वह नमाज अता कर
रही थी। पहली नजर में उसका दिल जोया पर ऐसा अटका कि स्कूल जाने से लेकर घर आने तक
कभी उसने जोया का पीछा नहीं छोड़ा। उसका यह इश्क बचपन से शुरू हो जाता है और जवानी
तक कायम रहता है|जब वो स्कूल में
होता है उसी दौरान गंगा किनारे यूपी के
आम लौंडों की तरह कुंदन ज़ोया को कार्ड देता है और शायरी के ज़रिए अपने प्रेम का
इज़हार करने की कोशिश करता है।
एक दिन जब कुंदन अपने प्यार का
सबूत देने के लिए अपनी कलाई काट लेता है तो ज़ोया सबके सामने उसे गले लगा लेती है|कुंदन के एकतरफा प्यार के लिएजोया की यह
स्वीकृति है,खबर जोया के
पिता तक पहुंचती है। जोया पहले अपनी फूफी के पास अलीगढ़ भेज दी जाती है। वहां से
आगे की पढ़ाई के लिए वह जेएनयू चली जाती है। इधर बनारसी आशिक अपनी जोया के इंतजार
में दिन गुजार रहा है। जेएनयू से जोया लौटती है तो फिर से मुलाकातें होती हैं। प्रेमी
यानि धनुष को ये लगता है कि सोनम के लौटते ही दोनों की मोहब्बत फिर से परवान
चढ़ेगी। लेकिन वक्त सबकुछ बदल देता है।जोया बातों ही बातों में उसे अपने जेएनयू के
प्रेमी के बारे में बता देती है।
'रांझणा' का
बनारस अपनी बेफिक्री, मस्ती और
जोश के साथ मौजूद है। कुंदन, जोया,
बिंदिया, मुरारी, कुंदन
के माता-पिता, जोया के माता-पिता
और बाकी बनारस भी गलियों, मंदिरों,
घाट और गंगा के साथ फिल्म में प्रवहमान
है।भारत के खूबसूरत शहर बनारस की अगर आपने सैर नहीं
की तो फिल्म रांझणा देख आइए । बनारस की गलियों में नाचिए, कूदिए, वहां की होली का मज़ा लीजिए। जुलूस और शादियों में शामिल होइए
और अगर रिक्शा वाला आपकी बातों पर ठेठ बनारसी लहजे में कुछ कहे तो हैरान न हो जाइए।ये
बनारस हैभैया और
यहीं की मिट्टी में ही जन्म लेती है कुंदन और ज़ोया की कहानी।
बनारसकेआंखोंकोपसंदआनेवालेसीनकाफीभातेहैं|'रांझणा'कीकहानीबनारसमेंरचीगईहै|कुंदनजोयासेप्यारकरताहै|उसकानामजाननेकेलिएपंद्रहचांटोंतककास्वादचखताहै| धनुषकईसीन्समेंअच्छेलगतेहैंऔरअपनीतरफसेकुंदनमेंपूरीजानडालतेनजरआतेहैं|धनुषनेअच्छीऐक्टिंगकरनेकीकोशिशकीहै|उनकेफ्लैटवनलाइनरकहीं-कहींबहुतअच्छेलगतेहैं|धनुष, परंपरागतहिंदीफिल्मोंकेहीरोकीतरहनहींदिखतेलेकिनउन्होंनेजिससहजतासेअपनेकिरदारकोनिभायाहैवोक़ाबिल-ए-तारीफहै|अभय
देओल नेएक तेजतर्रारछात्रनेताजसजीतकेकिरदारकोकाफीप्रभावीढंगसेनिभायाहै,उन्हेंजितनामौकामिलाउतनेमेंअपनेहाथदिखागए|सोनमकपूरबहुतख़ूबसूरतलगीहैंऔरउन्होंनेअपनेकिरदारकोभीउसीख़ूबसूरतीसेनिभायाहै|इंटरवलसेपहलेसोनमकाकिरदारकुछदबासालगताहै, लेकिनइंटरवलकेबादसोनमनेअच्छाकामकिया।मोहम्मदजीशाननेकुंदनकेदोस्तमुरारीकेकिरदारमेंजानडालदीहै।बिंदियाके
रूप में स्वराभास्करभीधमालहैं|दोनोंनेफिल्ममेंजानडालदीहैऔरकहीं-कहींतोयेमेनलीड्सकोखाजातेहैं|थिएटरग्रुपअस्मिताकीशिल्पीमारवाहऔरअरविंदगौड़फिल्ममेंनजरआए।
हिमांशु शर्मा की कहानी ताज़ा
तरीन है और वाराणसी की झलक साफ़ नज़र आती है|कुंदन, ज़ोया, बिंदिया और कुंदन के दोस्त मुरारी (मोहम्मद ज़ीशान
अय्यूब) का चित्रण बेहतरीन तरीके से किया गया है|इंटरवल से पहले का हिस्सा इतना मनोरंजक है कि पता ही नहीं चलता कि कब
इंटरवल हो गया|फिल्मकारोमांटिकस्टोरीसेराजनैतिकबैकड्रॉपपरआना, दिल्लीकेजेएनयूइलेक्शन्सकीओरभटकना, कहानीकोसेकंडहाफमेंढीलाबनादेताहै।इंटरवल
के बाद फिल्ममें राजनीतिक गतिविधियों पर ज़्यादा ज़ोर दिया गया हैकुल मिलाकर फिल्म
की कहानी काफी हटकर और दिलचस्प है| कहानी में ड्रामा, सस्पेंस, रोमांस, हास्य, इमोशन सब कुछ हैं|इंटरवल के बाद कहानी की रफ्तार सुस्त पड़ती है, लेकिन आखिरी 10मिनट की फिल्म का जवाब नहीं।
ए आर रहमान का संगीत कर्णप्रिय है|बनारसिया, तुम तक, टाइटल ट्रैक और तू मन शुद्धि गाने गुनगुनाने लायक हैं|फिल्म के गाने
धीरे-धीरे और लोकप्रिय होंगे|इरशाद क़ामिल के
बोल बहुत अच्छे हैं|बॉस्को-सीज़र की कोरियोग्राफी ज़बरदस्त है|श्रेया
घोषाल, जावेद अली, हरिहरण, रबी शेरगिल और म्यूज़िक के कई उस्तादों की आवाज़
ने कहानी में जान डाली दी है।
बनारस का कोना-कोना,गलियां, रिक्शेवाले की टिप्णणी,
गोलगप्पे वाले, ठेले कहानी में हर रंग बिखेर रहे हैं। सेकंड हाफ में दिल्ली दिखाई गई है।
इंडिया गेट,इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्यूनिकेशन का कैंपस और अगर आप गौर से देखेंगे
तो पंजाब में जो अभय का महल जैसा घर दिखाया गया है,
वो असल में पटौदी पैलेस है।
'रांझणा' कुंदन
और जोया की अनोखी असमाप्त प्रेम कहानी है।कुंदन अपनी जोया के लिए किसी हद तक जा
सकता है।उसका दिल सीने के बीच में अटक गया है, इसलिए उसे बाएं या दाएं दर्द महसूस नहीं होता।
'रांझणा'
की प्रेमकहानी शब्दों में नहीं बांधी जा
सकती, क्योंकि कुंदन, जोया, अकरम, मुरारी, बिंदिया समेत अन्य किरदारों के भावोद्रक और
अभिव्यक्ति का वर्णन मुश्किल है। फिल्म देख कर ही उन्हें समझा जा सकता है।जेएनयू
के छात्र जीवन, राजनीति और अकरम
के चरित्र में आनंद राय ने सरलीकरण से काम लिया है। छात्र राजनीति और जेएनयू के
छात्र जीवन से वाकिफ दर्शकों के लिए ये घटनाएं अपेक्षाकृत सिनेमाई आजादी के सहारे
गढ़ी गई है।लेकिन रांझना सिर्फ लव स्टोरी
नहीं है, इसमें प्यार है,सियासत है, आम आदमी का संघर्ष है और एक प्रेमी का पश्चाताप है।
फिल्म के डायलॉग आम जिंदगी से जुडे हुए हैं। मसलन...'अबे ये रिक्शेवाले, पैसे न लेना मैडम
से, भाभी है
तुम्हारी'।
एक ऐसी लव स्टोरी जो शुरू से
आखिर तक आपको बांधे रखती है। दिल्ली और बनारस की लोकेशन, धनुष और मोहम्मद अयूब की बेहतरीन ऐक्टिंग।इनदिनोंबॉलीवुडमेंलवस्टोरियोंकादौरहै, तोफिल्मकेबॉक्सऑफिसप्रदर्शनकोलेकरकुछनहींकहाजासकतागली-मोहल्लेकेरोमांससेलेकरकॉलेजपॉलिटिक्सजैसामसालाशामिलहै
|डायलॉगबाजीचटपटीहै \
रंझना का तमिल वर्जन भी
अंबिकपाथी के नाम से जल्द ही आ हो रही है |
निर्माता -कृषिका लुल्ला, सुनील लुल्ला|
निर्देशक –आनंद एल. राय|
कलाकार –धनुष, सोनम कपूर,अभय देओल,मोहम्मद जीशान, स्वरा भास्कर,कुमुद मिश्रा, सुजाता
कुमार, विपिन शर्मा, अयूब, शिल्पी
मारवाह,
अरविंद गौड़|
कहानी और संवाद–हिमांशु
शर्मा
गीत –इरशाद कामिल
संगीत –ए.आर.रहमान
आवाज़ –श्रेया घोषाल, जावेद अली, हरिहरण, रबी शेरगिल
अवधि - 140 मिनट
बजट –35करोड़ रु.
मूवी टाइप– रोमांटिक

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salam india
ab suruat ho rahi hai ek naye aaj ki
dekhte rahiye
mother india..............